भारत में 2026 में महिलाओं की स्वतंत्रता
प्रगति, चुनौतियाँ और भविष्य की राह
भारत एक ऐसा देश है जहाँ महिलाएँ सदियों से समाज की रीढ़ रही हैं, फिर भी उनकी स्वतंत्रता और अधिकारों की लड़ाई आज भी जारी है। 2026 के शुरुआती दिनों में जब हम महिलाओं की स्थिति पर नजर डालते हैं, तो एक मिश्रित तस्वीर उभरकर सामने आती है। एक ओर सरकार की योजनाएँ और सामाजिक बदलाव महिलाओं को सशक्त बना रहे हैं, तो दूसरी ओर लैंगिक असमानता, सुरक्षा की कमी और कार्यबल में कम भागीदारी जैसी चुनौतियाँ बरकरार हैं। इस लेख में हम 2026 की वर्तमान स्थिति का विश्लेषण करेंगे।
प्रगति के संकेत
पिछले कुछ वर्षों में भारत में महिलाओं की स्वतंत्रता के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति हुई है। शिक्षा के मोर्चे पर महिला साक्षरता दर बढ़कर लगभग 77-78% हो गई है, जो पुरुषों की 84-85% से अभी पीछे है, लेकिन तेजी से सुधार हो रहा है। सरकार की योजनाएँ जैसे बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ, मातृत्व लाभ और कार्यस्थल पर सुरक्षा संबंधी कानूनों ने महिलाओं को आगे बढ़ने का अवसर दिया है।
कार्यबल भागीदारी में भी सकारात्मक बदलाव देखने को मिल रहा है। 2025 के आंकड़ों के अनुसार, महिलाओं की श्रम बल भागीदारी दर (LFPR) 34% के आसपास पहुँच गई है, जो 2024 से काफी बेहतर है। अगस्त 2025 में यह 33.7% थी और अक्टूबर तक 34.2% हो गई। सरकार का लक्ष्य 2030 तक इसे 55% तक पहुँचाना है। बजट 2025-26 में महिलाओं के लिए विशेष प्रावधान, जैसे वर्किंग वुमन हॉस्टल और क्रेच सुविधाएँ, इस दिशा में महत्वपूर्ण कदम हैं। राजनीतिक भागीदारी भी बढ़ रही है, जहाँ महिलाएँ पंचायत स्तर से लेकर संसद तक अपनी आवाज उठा रही हैं।
सुरक्षा के क्षेत्र में भी कुछ सुधार हुए हैं। फास्ट-ट्रैक कोर्ट और कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न संबंधी कानूनों को मजबूत किया गया है। अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस 2025 पर सरकार ने कई योजनाओं की घोषणा की, जो महिलाओं को आर्थिक स्वतंत्रता प्रदान करने पर केंद्रित थीं।
बनी हुई चुनौतियाँ
हालाँकि प्रगति हुई है, लेकिन 2026 में भी महिलाओं की स्वतंत्रता कई बाधाओं से घिरी हुई है। विश्व आर्थिक मंच की ग्लोबल जेंडर गैप रिपोर्ट 2025 में भारत 148 देशों में 131वें स्थान पर है, जिसका स्कोर मात्र 64.4% है। यह 2024 से गिरावट दर्शाता है। जेंडर इनइक्वालिटी इंडेक्स में भी भारत की रैंकिंग 108-110 के आसपास है, जो स्वास्थ्य, शिक्षा और आर्थिक भागीदारी में असमानता को उजागर करता है।
महिलाओं की सुरक्षा आज भी सबसे बड़ी चिंता है। 2025 के सर्वेक्षणों में 40% महिलाएँ अपने शहर में असुरक्षित महसूस करती हैं। ऑनलाइन यौन उत्पीड़न और शोषण के मामले बढ़ रहे हैं, जिसके लिए मजबूत कानूनों की मांग उठ रही है। घरेलू हिंसा, दहेज संबंधी अपराध और कार्यस्थल पर भेदभाव अभी भी व्यापक हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाओं की इंटरनेट पहुँच मात्र 21% है, जो डिजिटल स्वतंत्रता को सीमित करती है।
कार्यबल में भागीदारी भले बढ़ रही हो, लेकिन यह मुख्य रूप से असंगठित क्षेत्र में है। देखभाल का असमान बोझ और सुरक्षित नौकरियों की कमी महिलाओं को पीछे रखती है। सामाजिक रूढ़ियाँ, जैसे संपत्ति अधिकारों में भेदभाव (खासकर मुस्लिम और हिंदू पर्सनल लॉ में) स्वतंत्रता को बाधित करती हैं।
भविष्य की दिशा
2026 में महिलाओं की स्वतंत्रता को मजबूत करने के लिए बहुआयामी दृष्टिकोण की जरूरत है। शिक्षा और कौशल विकास पर जोर देते हुए महिलाओं को आर्थिक रूप से स्वतंत्र बनाना आवश्यक है। सुरक्षा के लिए सख्त कानून लागू करना, पुलिस सुधार और जागरूकता अभियान चलाना चाहिए। डिजिटल सुरक्षा और इंटरनेट पहुँच बढ़ाकर महिलाओं को नई संभावनाएँ देनी होंगी।
भारत तब तक स्वतंत्र नहीं कहला सकता जब तक उसकी हर महिला सुरक्षित, स्वतंत्र और सशक्त न हो। 2026 का यह वर्ष बदलाव का अवसर है सरकार, समाज और व्यक्ति मिलकर महिलाओं की स्वतंत्रता को नई ऊँचाइयों तक पहुँचा सकते हैं। यह न केवल नैतिक जरूरत है, बल्कि आर्थिक विकास की कुंजी भी।
(संदर्भ, विश्व आर्थिक मंच रिपोर्ट 2025, पीरियोडिक लेबर फोर्स सर्वे 2025, और विभिन्न सरकारी तथा अंतरराष्ट्रीय रिपोर्ट्स पर आधारित।)